गुरुदेव श्री स्थित प्रज्ञानंद जी श्री हैप्पीनेस गुरु के नाम से भी जाने जाते हैं। आपने तनाव मुक्त समस्या रहित और सुखद जीवन के लिए अपने सिद्ध गुरु के आदेशानुसार जीवन के विभिन्न पहलुओं पर 35 वर्षों तक गहन शोध एवं अध्ययन कर जीसा थेरेपी रूपी एक रोडमैप तैयार किया जो एक खुशहाल जीवन के लिए वरदान साबित हुआ है।
गुरुदेव स्थितप्रज्ञानंद जी(एस. डी. वैष्णव) का जन्म 1961 में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के भादसौड़ा गांव में हुआ। बचपन से ही मेधावी छात्र रहे और आपको गणित, भौतिकी एवं ब्रह्मांड विषयों में विशेष रूचि थी।
आपने वर्ष 1982 में विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और वर्ष 1984 में गणित में स्नात्तकोत्तर (M. Sc.) की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1985 में बैंकिंग सेवा में चयनित होकर बैंक प्रबंधक के रूप में सेवायें देना प्रारंभ किया। विशिष्ट उपलब्धियों के साथ निष्ठा एवं ईमानदारी की एक मिसाल कायम करते हुए 36 वर्षों की सफलतम सेवाओं के पश्चात वर्ष 2021 में वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत हुए।
गुरुदेव के बचपन में घटित कुछ घटनाओं और परिस्थितियों ने उनके मन में मानव जीवन को समझने की गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की वह सोचते रहते थे कि जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए?
एक व्यक्ति के विभिन्न विचारों एवं व्यवहारों के पीछे क्या कारण होते हैं?
सफलता और असफलता, रोग, तनाव जन्म एवं मृत्यु से जुड़े अनेक प्रश्नों के उत्तर खोजने की जिज्ञासा ने उन्हें वर्ष 1978 में दसवीं कक्षा के दौरान ही शोध एवं अध्ययन प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।
वर्ष 2002 तक आपने भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन पर आधारित लगभग सभी जिज्ञासाओं के उत्तर प्राप्त कर लिए थे। जीवन को समृद्ध एवं सुखद बनाने के रहस्य को जानने के बाद वर्ष 2003 में “नो यश नो पैसा” के सिद्धांत पर आमजन की सेवा करने का संकल्प लिया।
वर्ष 2003 से और 2010 तक प्रत्येक रविवार को अपने निवास पर सेवाएं देना आरंभ किया। वर्ष 2011 से वर्ष 2020 तक किराए के परिसर में सेवा दी गई एवं वर्ष 2021 में बैंकिंग सेवा से सेवानिवृत होने के पश्चात संस्थान के अपने परिसर में अपने द्वारा विकसित जीसा थेरेपी – जीवन से साक्षात्कार के माध्यम से तनावमुक्त खुशहाल जीवन के लिए देश एवं दुनिया में एक मुहिम चला रहे हैं।
गुरुकृपा
गुरुदेव श्री स्थित प्रज्ञानंद जी पर बचपन से ही ईश्वर की विशेष कृपा रही है। जीवन में कई बार आपने ईश्वरीय शक्ति का अनुभव प्राप्त किया। आपका यह मानना है कि आप से गुरु का मिलना भी ईश्वरी शक्ति की विशेष अनुकंपा रही है जिसने आपको सहज में ही हिमालयवासी, युगदुर्लभ, तत्वदर्शी, दिव्यसंत की कृपा दृष्टि का पात्र बना दिया। यह गुरु कृपा ही आपके आध्यात्मिक पथ का आधार बनी और इसी कृपा ने आपके अंतःकरण में जनकल्याण की पवित्र भावना को जागृत किया। इस दिव्य कृपा का आरम्भ 1968 में हुआ।
जब आप 7 वर्ष के थे सदैव अपने घर से भाग कर एक मंदिर में निर्वासित अपने दादाजी के पास चले जाते थे। एक दिन आप दादाजी के सानिध्य में हारमोनियम पर भजन गा रहे थे। उसी समय दादाजी के गुरुदेव श्री त्रिनेत्रभिलाषी जी महाराज का आगमन हुआ जिन्हें हम श्रद्धा पूर्वक बड़े गुरुदेव कह कर संबोधित करते हैं।
उनकी दिव्य दृष्टि ने बालक शंभूदास (गुरुदेव) की असाधारण आध्यात्मिक क्षमता को पहचान लिया और उन्होंने बालक को उसी क्षण अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। बड़े गुरुदेव ने दादाजी से बालक को अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की परंतु दादाजी के अनुरोध पर उन्होंने तत्काल संन्यास की दीक्षा ना देकर गृहस्थ रूप में ही आध्यात्मिक दीक्षा प्रदान की।
इस प्रकार बाल्यकाल में ही एक दिव्य संत की कृपा ने आपको आध्यात्मिक साधना और जल कल्याण के पथ पर अग्रसर किया। बड़े गुरुदेव अधिकांश हिमालय में ही निवास करते थे। 10 से 20 वर्षों में आपका मिलना होता था। बड़े गुरुदेव पहुंचे हुए ब्रह्मज्ञानी संत थे। उनकी कई विशेषताओं में से एक विशेषता सूक्ष्म शरीर धारण करने की थी।
इसका प्रमाण संस्थान के दीक्षार्थियों एवं उनके परिवारजनो ने प्रत्यक्ष देखा है आप बड़े गुरुदेव ने दिनांक 05-09-2023 से दिनांक 07-09-2023 तक संस्थान में तीन दिनों तक सूक्ष्म रूप में प्रवास किया था। उन तीन दिनों में संस्थान के सदस्यों ने आपकी सूक्ष्म उपस्थिति को दिव्य सुगंध के रूप में अनुभव किया था। किसी को चंदन की शीतल सुगंध का, किसी को गुलाब की कोमल और माधुर्यपूर्ण सुगंध का आभास हुआ तो किसी को इन सभी सुगंधों के अद्भुत सम्मिलित रूप की भी अनुभूति हुई।
कुछ लोगों ने ऐसी दिव्य सुगंध का अनुभव किया जिसकी अनुभूति जीवन में पहले कभी नहीं की थी मानो वह सुगंध किसी पार्थिव स्रोत से नहीं बल्कि किसी उच्च आध्यात्मिक स्त्रोत से प्रवाहित हो रही हो।
वे क्षण वास्तव में अप्रतिम और अविस्मरणीय थे। देहातीत अनुभूति और सूक्ष्म-देह में यात्रा के विषय में शास्त्रों में पढ़ा और कथाओं में सुना अवश्य था किंतु यह अनुभूति की वर्तमान युग में भी ऐसे दिव्य संत विध्यमान हैं जो हिमालय से सूक्ष्मदेह में कहीं भी आकर साधकों को अपना सानिध्य प्रदान कर सकते हैं यह बात सभी के लिए आश्चर्य एवं परमानंद का विषय थी।
उन दिनों की अनुभूतियों और भावों को संस्थान के सदस्यों ने श्रद्धापूर्वक लिखकर भी सजोकर रखा है ताकि समय समय पर उन दिव्य क्षणों का स्मरण कर पुनः उसी सुगंधित व आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव किया जा सके। उन स्मृतियों को पढ़ाते हुए आज भी हृदय कृतज्ञता से भर उठता है – की प्रभु की अनंत कृपा से ऐसे युगदुर्लभ तत्वदर्शी संत का सूक्ष्म सानिध्य प्राप्त करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ। इस प्रवास के दौरान ही बड़े गुरुदेव ने गुरुदेव को एस. डी. वैष्णव से स्थित प्रज्ञानंद के नाम से दीक्षा प्रदान की।
अपने दीर्घ एवं तपोमय जीवन में वे लगभग 165 वर्षों तक देह में स्थित रहे और अंततः कार्तिक पूर्णिमा के पावन दिवस दिनांक 05-11-2025 को पूर्ण शांति और स्वेच्छा से भगवद धाम की ओर प्रस्थान कर गए।
बड़े गुरुदेव के मार्गदर्शन एवं आदेश पर तनाव मुक्त सुखद जीवन पर शोध एवं अध्ययन कार्य प्रारंभ किया गया और उन्हीं के आध्यात्मिक आशीर्वाद एवं प्रेरणा से जीसा – जीवन से साक्षात्कार का प्रादुर्भाव हुआ।
